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रविवार, 21 मार्च 2010

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

फ़िर जेल कब जाओगे?

डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जब पटना सदर जेल में थे, तब श्री गोडबोले के आदेश से कई डाक्टरों ने उनकी जांच की। इससे धीरे-धीरे उनकी सेहत में सुधार आने लगा। कुछ दिन बाद निकट के सम्बन्धियों से मुलाक़ात की सुविधा मिलाने लगी। एक माह में २ मुलाकातें और २ पात्र लिखने की छूट थी। राजेन्द्र बाबू ने पात्र लिखने के बदले मुलाक़ात का विकल्प लिउया। यानी अब माह में ४ मुलाकातें यानी हर हफ्ते मुलाक़ात। मुलाक़ात में पहले केवल ५ लोगों को जाने दिया जाता था। बाद में घरवालों के लिए इसमें थोड़ी छूट मिलाने लगी। बीमारी के कारण राजेन्द्र बाबू से मुलाकातें उनके लिए तय कमरे में होती थी, बाद में वही कमरा उन्हें दे भी दिया गया रहने के लिए। मुलाकातें भी इसी कमरे में होतीं। राजेन्द्र बाबू उस कमरे में १९४२ से १९४५ तक रहे। उनके साथ दूसरे बड़े लोग, जो वहाँ कैद करके लाये गए थे, वहीं उनके साथ रहे। उनकी देखभाल के लिए पहले बाबू मथुरा प्रसाद और बाद में श्री चक्रधर शरण वहीं रखे गए। हजारीबाग जेल से पारी-पारी कई अन्य मित्रों को भी सरकार वहाँ ले आई।मुलाक़ात के लिए सारा परिवार, जो उस दिन पटना में होता, जाता। ५ की गिनती में बच्चे नहीं आते थे। १९४२ में राजेन्द्र बाबू का पोता अरुणोदय प्रकाश लगभग एक साल का था। वह भी जाता था। धीरे-धीरे वह चलने और दौड़ने लगा। जेल के फाटक पर पहुंचाते ही उसे खोलने के लिए शोर मचाने लगता। अपनी तोतली जुबां में पुलिस को दांत भी लगाता। फाटक खुलते ही वह सीधा राजेन्द्र बाबू के कमरे की दौड़ लगाता। वह उसे ही अपने बाबा का घर समझ बैठा था। जेल में बच्चों को २-३ बार मिठाईयां मिलीं। फ़िर क्या था, बच्चे वहाँ पहुंचाते ही खाने-पीअने की फरमाइशें शुरू कर देते। राजेन्द्र बाबू भी मुलाक़ात के दिन पहले से ही इसका प्रबंध करके रखते।बच्चों को सप्ताह में एक बार बन-संवर कर जेल जाने की आदत पड़ चुकी थी। इसे वे सैर-सपाटे का एक हिस्सा मानने लगे थे। इसमें मिठाई का भी काफी लोभ थाजब १९४५ में राजेन्द्र बाबू छूटकर घर आए तो उनके पोते को बड़ी खुशी हुई। फ़िर जब उसके जेल जाने यानी सैर का दिन आया तो उसे न कोई बाबा के घर (जेल) ही ले गया और ना ही किसी ने उसे मिठाई ही दी। तब उसे बाबा का घर आना रुचा नहीं। तीसरे-चौथे दिन तो उसने पूछ ही लिया -" बाबा, फेर जेल कब जैईब'?

जब मैं पैदा हुई तो मुझमें दोष था क्योंकि मैं लड़की थी

अनीता वर्मा ने नए संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' से एकाध कविताएं यहां हाल में आप पढ़ चुके हैं. मैं जितनी बार इस किताब को पढ़ता हूं जीवन और कविता पर मेरा विश्वास गहराता जाता है. अनीता जी ने इस किताब में वाक़ई जादू किया है. जादू करने के लिए कोई जतन नहीं लगाया है, चीज़ों को और भी सादगी नवाज़ी गई है. मैं इस संग्रह से आपको अभी कई उल्लेखनीय चीज़ें पढ़वाऊंगा. इस सीरीज़ में फ़िलहाल ये दो कविताएं और प्रस्तुत हैं:
दोष
जब मैं पैदा हुई तो मुझमें दोष थाक्योंकि मैं लड़की थीजब थोड़ी बड़ी हुई तब भी दोषी रहीक्योंकि मेरी बुद्धि लड़कों से ज़्यादा थीथोड़ी और बड़ी हुई तो दोष भी बड़ा हुआक्योंकि मैं सुन्दर थी और लोग मुझे सराहते थेऔर बड़ी होने पर मेरे दोष अलग थेक्योंकि मैंने ग़लत का विरोध कियाबूढ़ी होने पर भी मैं दोषी रहीक्योंकि मेरी इच्छाएं ख़त्म नहीं हुई थींमरने पर भी मैं दोषी रही क्योंकि इन सबके कारण असंभव थी मेरी मुक्ति.
रोशनी
उसका नाम रोशनी थाआदिवासी एक लड़कीजिसे बनना था ननवह कभी पागलों सा करतीमोटे लाल पपोटे उसकेजंगली फूलों से दिखतेबोलती तो लकड़ी के दरवाज़े थरथरातेआरियों सी काटती उसकी चीख़
मुझे पता है मेरा अंतयहीं कहीं है वह आसपासफूल-फूल नहीं प्यार नहींमुरझाना है मुझे वसन्त मेंसूरज बनना हैलाल एक पहाड़कोई दो मुझे मेरी नींद
दिलासा एक आसान पत्थर था जिस पर पतक देती वह सरसिस्टर कैथरीन उसे बांहों में भर लेतींरोशनी मेरी बच्ची
कई वर्ष बाद मिली रोशनीमेडिकल कॉलेज मेंवह डॉक्टर बन रही थीअच्छा करेगी वहबच्चों को और स्त्रियों कोबच्चे, स्त्री, ग़रीब रोशनी.