रविवार, 23 मई 2010
आरटीआई गीत
आरटीआई गीत
कैंह कुनी बाबूएं फाईल है दबाई।
खुलणी कलाई पता लगणी सच्चाई।।
कुनी कुनी खादियो पापे दी कमाई।
खुलणी कलाई पता लगणी सच्चाई।।
कुण मस्टोल किन्हां फर्जी बणाया।
रेत किन्ही पाई किन्हां सीमेंट लगाया।।
सैंपल भराणे, किन्ही रेशो है लगाई।
खुलणी कलाई पता लगणी सच्चाई।।
बुधवार, 19 मई 2010
बच्चे बचाएंगे थियेटर का वजूद



रविवार, 16 मई 2010
कांगड़ा जिला के दस ब्लॉक में 205 शिकायतें हुई दर्ज
नरेगा की लूट, नगरोटा को छूट
नगरोटा विकास खंड में पहुची नरेगा को लेकर सबसे ज्यादा 66 शिकायतें
रैत ब्लाक में आईं 48 शिकायतें, बीडीओ लंबागांग के पास 24 ्रशिकायतें
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना(मनरेगा) के नाम पर जिला कांगड़ा में धडल्ले से सरकारी फंड का मिस यूज हो रहा है। केंद्र की इस योजना के तहत पंचायतों के विकास के लिए मिले धन की हेराफेरी के अलावा कम भुगतान, देरी से भुगतान जैसे मामले भी खुल कर सामने आ रहे हैं। कांगड़ा जिला में वर्ष 2008- 09 में मनरेगा को लेकर जिला के विभिन्न 10 ब्लॉकों में 205 शिकयतें दर्ज हुई हैं। आंकड़े गवाही भरते हँैं कि मनरेगा की लूट में नगरोटा बगवां को जैसे छूट मिली हो। इस ब्लॉक में सबसे ज्यादा 66 शिकायतें मनरेगा को लेकर दर्ज हुई । यहां सबसे ज्यादा 27 शिकायतें मनरेगा के तहत ग्रामीण विकास के लिए आए सरकारी धन की हेराफेरी से संबंधित है जबकि 39 शिकायतें मिसयूज ऑफ अथवा दूसरी प्रकृति की हैं। लंबागांव ब्लॉक में मनरेगा से सबंधित 29 शिकायतें बीडीओ ऑफिॅस तक पहुंची हैं। लंबागांव के बाद रैत ब्लॉक 48 श्किायतों के साथ दूसरे तीसरे नंबर पर है। यह खुलासा आरटीआई ब्यूरो के सदस्य जगदीप ठाकुर की ओर से डीसी कांगड़ा से प्राप्त जानकारी में हुआ है। आरटीआई ब्यूरों के संयोजक लवण ठाकुर का कहना है कि मनरेगा की शिकायतों से सबंधित आधी अधूरी सूचना उपलब्ध करवाई गई है, इस बोर में डीसी कांगड़ा के पास सूचना अधिकार कानून के तहत फस्र्ट अपील दायर की गई है।
15 दिन का नाम, 15 माह बाद भी नाकाम
मनरेगा कार्यक्रम में आने वाली शिकायतों को 15 दिन में समाधान करने का प्रावधान है, लेकिन हैरानी इस बात की है कि 15 माह बीत जाने के बावजूद मनरेगा की कई श्किायतों का निपटारन करने में जिला कांंगड़ा प्रशासन नाकाम साबित हुआ है। अभी तक भी इस बारे आई 17 शिकायतों का कोई निपटारा नहीं हो पाया है और विभिन्न चरणों में लंबित पड़ी हैं। आरटीआई ब्यूरो ने इस बारे में भी डीसी कांगड़ा से सूचना मांगी है कि आखिर निर्धारित समय अवधि में किन कारणों से ऐसी श्किायतों का निपटारा नहीं हो पाया है।
किस ब्लॉक में कितनी शिकायतें
ब्लॉक शिकायतों की संख्या
नगरोटा बगवां 66
रैत 48
लंबागांव २९
कांगड़ा 24
परागपुर १०
इंदौरा १०
देहरा ०७
धर्मशाला ०६
बैजनाथ ०२
नूरपुर 03
कुल शिकयतें 205
शनिवार, 15 मई 2010

सोमवार, 10 मई 2010
छोटे भाई की कमाई पर काबिज बड़ा भाई
छोटे भाई की कमाई पर काबिज बड़ा भाई
पुनर्गठन एक्ट के अनुूसार नहीं मिला हिमाचल प्रदेश को अपना हिस्सा
कोट्र्र के बाहर मिल कर मसला हल करने की कवायद भी गई बेकार
बतीस साल में लोकसभा चुनाव में कभी नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा
बड़े भाई पंजाब ने छोटे भाई हिमाचल प्रदेश के हकों पर तगड़ा डाका डाला है। 1966 में हुए पुनर्गठन के तहत पड़ोसी पंजाब से मिलने वाला हिमाचल प्रदेश का हिस्सा 32 साल के संघर्ष के बावजूद नहीं मिल पाया है। 1966 के पनर्गठन एक्ट के जिस शेयर को देने की हामी पंजाब ने भरी थी, लेकिन हेकड़ी देखिये वार्ता की टेबल पर मसले का हल नहीं होने के बाद पंजाब को अब कोर्ट में अपने हकों की पैरवी करनी पड़ रही है। दोनों प्रंदेशों मेें कई बार एक ही पार्टी की सरकारे आई और आकर चली गईं, लेकिन कांग्रेस — भाजपा दोनों की पार्टियां इनसाफ करने में नाकाम रही। दोनों प्रदेशों के नेताओं के अलावा मुख्य सचिव तक ने इन फाईलों पर हरकत की लेकिन नतीजा ढाक के ही सौ पात रहा। मिल बैठ कर भी मसले हल करने की लंबी कवायद चली।
मुख्यमंत्री के रुप में अपनी पहली पारी खेलते हुए पिछली बार प्रेम कुमार धूमल ने पंजाब के तत्कालिन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथ लंबी वार्ताओं का सिलसिला शुरु किया लेकिन मामला फिर बीच में ही अटका रह गया। वर्तैमान में भी जहां प्रदेश में भाजपा की सरकार है आर पंजाब में भाजपा समर्थित आकाली सरकार राज कर रही है लेकिन यह मसला इस बार भी गौण ही रहा है। यह मुद्दा प्रदेश की विधानसभा में कइ्र बार गूंजा, कई बार इस मुद्दे पर विपक्ष ने सत्तापक्ष का साथ देते हुए प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजेे लेकिन दिल्ली में भी यह मामला नक्कारखाने की तूती ही साबित हुआ। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आफिस तक भी इस मसले की फाईल गई लेकिन पीएमओ आफिस के हस्तक्षेप के बावजूद मसला जस का तस ही रहा। इस मामले पर जहां हिमाचल सरकारों की भूमिका दब्बू छुटके की रही तो पंजाब ने दबंग बडक़े का ही रोल अदा किया। शर्मनाक यह है कि प्रदेश की प्रतिष्ठा से जुड़े इस मुद़दे को लोकसभा चुनाव में दोनों प्रमुख दलों कांग्रेस—भाजपा ने हमेशा नजरअदाज ही किया।हिमालय नीति अभियान समिति के समन्वयक एवं समाजसेवी कुलभूषण उपमन्यु और इंडियन पिपलज थियेटर के प्रदेश संयोजक लवण ठाकुर का कहना है कि अपने हकों की लड़ाई म केंद्र के पास अपना पक्ष रखने में कांग्रेस व भाजलपा दोनों सरकारें नाकाम ही साबित हुई हैं। पडोसी राज्य की हेकड़ी के चलते प्रदेश को हर साल करोड़ों की रगड़ लग रही है। दोनों प्रदेशों में एसक ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद इस मुद्दे का गौण रहना यह साबित करता है कि क्षेत्रीय हकों की पैरवी में बड़े प्रदेशों की खूब धौंस है।
इस मसले पर पंजाब के अडिय़ल रवैये को देखते हुए 1998 में प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोअ्र का दरवाजा खटखटाया था। मामला पिछले दस साल से में है। इस मसले को कोर्ट में ले जाने का श्रेय लेते हुए पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह कहते हैं कि कांग्रेस इस माले को लेकर कोर्ट में गई। सुप्रीम कोट्र में मामला आखिरी चरण में है और इस केस में हिमाचल प्रदेश की जीत तय है। प्रदेश कांग्रेस की ओर से प्रदेश को यह सबसे बड़ा तोहफा होगा। उधर वर्तमान मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का कहना है कि प्रदेश में अधिकतर कांग्रेस का ही राज रहा, लेकिन इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने कोट्र में जाने के अलावा मिल बेठ कर मसला हल करने तक की कोशिश नहीं की। कोर्ट के बाहर मसले सुलझाने की उनकी पहल पर कुछ इंटर स्टेट मुद्दे हल हुए है, अब भी प्रयास जारी हैं।
लड़ाई की जड़:
1966 पनर्गठन एक्ट के अनुसार भाखड़ा व्यास प्रबंधन बोर्ड बीबीएनबी से प्रेदेश को 7.19 प्रतिशत का स्टेट मिलना है। इसके अलावा भाखड़ा— नंगल, पौग डैम व व्यास पावर प्राजेक्टों से प्रदेश को 12 प्रतिशत बिजली मुफ्त मिलनी है। इसी एक्ट के तहत रियासतकाल में मंडी के जोगेंद्रनगर में बने शानन पावर प्राजेक्ट को भी हिमाचल प्रदेश को सौंपा जाना है। पुनर्गठन एक्ट के तहत ही हिमाचल प्रदेश को चंडीगढ़ पर भी 7.19 हिस्सा बनता है, जिसकी भरपाई पंजाब व हरियाणा ने करनी है। सियासी मचंों व प्रशासनिक प्रपंचों की लंबी कवायद के बावजूद लड़ाई जारी है।
रविवार, 9 मई 2010
अपनों के प्रहार संग गैरों की मार

अपनों के प्रहार संग गैरों की मार
दिल्ली में मजबूत होते ही हिमाचल में वीरभद्र सिंह की हिमाचल में मजबूत
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व विपक्ष की नेता ने अपने ही नेता के खिलाफ खोला मोर्चा
प्रदेश की भाजपा सरकार की आखों की किरकिरी बने केंद्रीय इस्पात मंत्री
वीरभद्र सिंह फिर आए पुराने विरोधी मेजर मनकोटिया के निशाने पर
दिल्ली में मजबूत होते ही केंद्रीय इस्पात मंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ हिमाचल में उनके विरोधी उनके खिलाफ मजबूत घेराबंदी करने में जुट गए हैं। उनके खिलाफ जहां अपनों के प्रहार जारी है, वहीं गैरों के शब्दबाण भी उन्हें झेलने पड़ रहे हैं। केंद्रीय इस्पात मंत्री के ताजा हिमाचल दौरे के दौरान जहां उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने उनके खिलाफ हमले दागे हैं, वहीं प्रदेश में सत्तासीन भाजपा सरकार की आंखों की भी किरकिरी बन गए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ठाकुर कौल सिंह और विधानसभा में विपक्ष की नेता विद्या स्टोक्स ने एक बार फिर से मुंह खोल दिया है। अपनी ही पार्टी के दो दिज्गजों के निशाने पर आए वीरभद्र सिंह के खिलाफ प्रदेश में सत्तासीन भाजपा सरकार के दिज्गज नेताओं ने भी जम कर हमले दागे हैं। इसी बीच पूर्व मंत्री एवं कांगड़ा के दिज्गज राजपूत नेता मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने यह कह कर सनसनी फैला दी है कि वीरभद्र सिंह ने प्रदेश में नई पार्टी का गठन करने के लिए बाया बाया संपर्क साधा था। हालांकि केंद्रीय मंत्री एवं उनके समर्थकों की ओर से विरोधियों के हर हमले का माकूल जवाब दिया गया है। कांग्रेंस के अंदर वीरभद्र सिंी समर्थक और विरोधी इस बात को लेकर आमने सामने होते आए हैं कि केंद्र की राजनीति में सक्रीय होने के बावजूद वीरभद्र सिंह प्रदेश की राजनीति का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। वीरभद्र सिंह अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ जुबान खोलते आए हैं। प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ भी जम कर हमले दागने में वीरभद्र सिंह हमेशा आगे रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा की ओर से भी वीरभद्र सिंह के खिलाफ जबरदस्त घेराबंदी की जाती है। दो राय नहीं है कि केंद्र में मंत्री होने के बावजूद वीरभद्र सिंह आज भी हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के सबसे दमदार नेता हैं। प्रदेश से भाजपा सरकार को उखाड़ फैंकने की बात वह बार बार कहते आए हैं। दिल्ली से हिमाचल प्रदेश की राजनीति में दखल रखने की वीरभद्र सिंह कोशिशें ही उनके कांग्रेस व भाजपा दोनों में विरोधियों को उनके खिलाफ एकजुट होने का कारण बनती है।
तकरार नहीं एकाधिकार
केंद्र की सियासत में प्रदेश के दो दिगज वीरभद्र सिंह व आनंद शर्मा मंत्री थे। आनंद शर्मा की हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा सदस्यता खत्म होने पर केंद्र की राजनीति में वीरभद्र सिंह इकलौते प्रतिनिधि रह गए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से बनाई गई कुछ केंद्रीय मंत्रियों की कोर कमेटी में उनको शामिल किया गया है, जिससे केंद्र की राजनीति में वह मजबूत हुए हैं। वीरभद्र सिंह ने पिछले दिनों दिल्ली में प्रतिनियुक्ति पर गए हिमाचल प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकरियों को दिए गए डिनर से भी वह एकाएक चर्चा में आए हैं। यह किसी से छुपा नहीं है कि वीरभद्र सिंह दिल्ली के बजाए प्रदेश की राजनीति को प्राथमिकता देते आए हैं।
कोटस
प्रदेश को केंद्र से मिलने वाली परियोजनाओं में केंद्रीय मंत्री अडंगा लगा रहे हैं। उनके इस रवैये के चलते प्रदेश की कई महात्वाकांक्षी परियोजनाओं के काम लटक रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह को लेकर मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का बयान ।
कोटस
हम बतौर विपक्षी दल विधानसभा में बंदूकें नहीं तान सकते। वीरभद्र सिंह जैसे पार्टी के कद्दावर नेता को इस तरह की बयानबाजी नहीं करनी चाहिए ।
ठाकुर कोल सिंह, अध्यक्ष प्रदेश कांग्रेस, वीरभद्र सिंह के बयान के बाद पत्रकार वार्ता में बोले।
कोटस
वीरभद्र सिंह कांग्रेस के एक वर्रिष्ठ नेता है। उनको अपनी ही पार्टी के नेताओं के ख्रिलाफ ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कांग्रेस प्रदेश में विपक्ष की भूमिका बेहतरीन ढंग से निभा रही है।
विद्या स्टोक्स, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, वीरभद्र सिंह के बयान के बाद बोली।
कोटस
अपनी ही पाटी्र के नेताओं से घिरे वीरभद्र सिंह ने क्षेत्रीय दल के गठन के लिए किसी के माध्यम से मुझे शामिल करने का प्रस्ताव भेजा था। वह विधानसभा चुनाव में कईयों को टिकट दिलाने के नाम पर अपने पीछे चला रहे हैं।
मेजर विजय सिंह मनकोटिया, पूर्व मंत्री पत्रकार वार्ता में बोले।
कोटस
मुख्यामंत्री प्रेम कुमार धूमल केंद्र की परियोजनाओं को अपना बता कर बाहबाही लूटते आ रहे हैं। मनकेाटिया जैसे लोग धूमल के हाथों की कठपुतली बन कर उनके हाथों में खेल रहे हैं।
वीरभद्र सिंह, केंद्रीय इस्पात मंत्री ।
अग्गे दोंड़ पिछें चौड़
अग्गे दोंड़ पिछें चौड़
कैहदी काहली, कैदी छोड़।
अग्गें दौड, पिछें चौंड।।
भुला रस्तें पखला माहणु ।
खड़ी चढ़ाई, करड़े मोड़।।
धणे लेई के आए गद्दी ।
माह, राजमाह कने खोड़।।
पक्के घड़े, कच्चे रिश्ते।
नी कदी भी लगदे जोड़।।
नी धरती ते कोई सुजदा।
गास्से छूणे दी है होड़ ।।
शुक्रवार, 7 मई 2010
कुल्हां

मंगदियां आईयां बलियां कुल्हां।।
देई सनंदरां मंगदियां जातर।
खसम खाणियां जलियां कुल्हां।।
खुने संदर, कोहली बुडढा।
ती खणोईयां गलियां कुल्हां।।
बतरां खातर बजियां ढोल़ां।
खूब नुहाइयां थलिय़ां कुल्हां।।
सुकियां खड्डां, मुकियां गल्ला
तां मिट्टिया रलिय़ां कुल्हां।।
चैतर महीना लेया सुनाणा।
ढोलरुआं बिच पलिय़ां कुल्हां।।
अस्पताल बीमार है

गैस का मर्ज है
बढ़ रही पीड़ है
ओपीडी में भीड़ है
ठीक मौका ताड़ कर
पर्ची का जुगाड़ कर
डॉक्टर के सामने पहुंचा मरीज है
बेवक्त उठता है, दर्द बदतमीज है
डॉक्टर की मजबूरी है
टेस्ट पहले जरूरी है
पर टका सा जवाब है
कि एक्सरे मशीन खराब है
स्टाफ की कमी है
नर्स मोबाइल पर रमी है
अब मरीज हैरान है
और तीमारदार परेशान है
टेक्रीशियन बेकार है
डॉक्टर लाचार है
मरीज की छोडि़ए
अस्पताल बीमार है।
पुल और बाँध
मैंने जब कभी
कहीं भी
तेरी तारीफों के
पुल बांधे हैं
मेरे कई
अपनों के
सब्र के बांध
टूटे हैं ।
हर घर के आगे आँगन होता था
हर घर के आगे आँगन होता था
हर गाँव में पनघट होता था ।
पनघट पे पीपल होता था ।।
सुना है कि हर घर के आगे ।
खुला सा आँगन होता था ।।
वो झूम के सावन आता था।
मदमस्त सा योवन होता था। ।
नाजुक थे फूलों से रिश्ते ।
हर रिश्ता पावन होता था ।।
बुधवार, 5 मई 2010
मुंशी बोलें, ठाणे अपणे।।

नी कदी अजमाणे अपणे।
गलां ते भी जाणे अपणे।।
अपूं जो ही खाणे अपणे।
जादा जे पतयाणे अपणे।।
है मेरी तेरी सांझी पूंजी।
गजलां तेरियां गाणे अपणे।।
खैरी अपणे, बैरी अपणे।
घरे घरे दे बाणे अपणे।।
हाकम बोलें, सर्कल अपणा।
मुंशी बोलें, ठाणे अपणे।।
गूंगे अपणे टोणे अपणे।
कुसने दुखड़े लाणे अपणे।।
कैंह बजोगण होई रावी
(चंबा प्रवास के दौरान 2007 में लिखित गजल)
मंगलवार, 4 मई 2010
शुरू हुआ टकराव, दिख गया बिखराव

चच्योट में सामने आ गई खोट