रविवार, 11 अप्रैल 2010

मिला है अधिकार, फिर भी है लाचार

बाजार में आज भी लुटने को मजबूर है पहाड़ का ग्राहक


मिला है अधिकार, फिर भी है


ठगे जाने के बाद भी चुप रहते हें 70 प्रतिशत ग्राहक


प्रदेश के 12 जिलों के लिए हैं सिर्फ 4 उपभोक्ता फोरम

यहां ग्राहकों के हकों की हिफाजत के लिए कानून बने लंबा अर्सा बीत चुका हो, लेकिन अपने अधिकारों के बारे में जागरूक न होने के कारण प्रदेश के ग्राहक आज भी बाजार में लुटने को मजबूर हैं। हैरानी तो इस बात को लेकर है कि यहां शिक्षित वर्ग हकीकत जानते हुए भी चुपी साध जाता है। इस बारे में हुई स्टडी का सनसनीखेज खुलासा है कि प्रंदेश में 70 प्रतिशत ग्राहक अपने अधिकारों का हनन होने की सूरत में भी उपभोक्ता फोरम तक अपनी शिकायत नहीं ले जाते हैं। इसकी एक खास वजह यह भी है कि प्रदेश के 12 जिलों के लिए सिर्फ चार जिला मुख्यालयों धर्मशाला, मंडी, शिमला और ऊना में ही उपभोक्ता फोरम स्थापित किए गए हैं जहां ग्राहक अपनी शिकायतें दायर कर सकते हैं। लंबा सफर और जटिल कानूनी प्रक्रिया के चलते उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाने की लोग ठगे जाने के बावजूद हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। उपभोक्ता फारमों में लंबित मामलों और फैसला होने में सालों खिंचने वाली थकान भरी कानूनी प्रक्रिया भी ग्राहकों के न्याय हासिल करने के लिए उठे हुए कदमों को रोक लेती है। ग्राहकों को जागरूक करने में जहां प्रदेश सरकार की भूमिका नाकारात्मक रही है, वहीं किसी गैर सरकारी संस्था ने भी उपभोक्ता अधिकारों को लेकर प्रदेशवासियों को जागरूक करने में रुचि नहीं दिखाई है। प्रदेश के उपभोक्ता अधिकारों की स्थिति को लेकर स्टडी करने वाली मुक्ता माक्टा की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 58 प्रतिशत उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकारी तक नहीं है। मुआवजे से ज्यादा हो जाता है खर्च रिपोर्ट के मुताबिक उपभोक्ता फोरम में उपभोक्ता अधिकारों के केस हल होने में औसतन 2 से 3 साल लग जाते हैं। लंबित मामलों की दर औसतन 6 प्रतिशत है। उपभोक्ता फारम तक अपनी शिकायत दर्ज करवाने और वकील आदि पर उपभोक्ता को इतना खर्च करना पड़ जाता है, केस जीतने के बाद जितना मुआवजा तक ग्राहक को नहीं मिल पाता है। ऐसे में ग्राहकों के लिए यह घाटे का ही सौदा है। जागरुकता को लेकर नहीं हो रहा कोई काम प्रदेश में उपभोक्ता अधिकारों को लेकर लोगों को जागरूक करने को लेकर सरकार और उपभोक्ता विभाग की भूमिका भी नकारात्मक ही रही है। यहां किसी गैर सरकारी संसथा ने भी इस क्षेत्र में पहल करने की धीर गंभीर कोशिश नहीं की हैं। उपभोक्ता अधिकार के हनन को लेकर हाल ही में मार्केटिंग कमेटी और मार्केटिंग कमेटी के एजेंटस के खिलाफ पुलिस में मामला दायर करने वाले आरटीआई ब्यूरो के संयोजक लवण ठाकुर कहते हैं कि ग्राहकों में जागरूकता का अभाव और जटिल कानूनी प्रक्रिया उपभोक्ताओं की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।

रसीद का मोल नहीं पता


प्रदेश में उपभोक्ता अधिकारों की स्थिति पर शोध करने वाली मुक्ता मोक्टा के विशलेषण के अनुसार ज्यादातर ग्राहक तो खरीद के बदले रसीद तक लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। उन्हें रसीद के महत्व तक का पता नहीं है। प्रदेश के 58 प्रतिशत ग्राहकों को फूड एंड एडल्ट्रेशन एक्ट, ड्रग्स एंड कॉस्मेअिक एक्ट, ब्लैक मार्केटिंग एंड मेंटेनेंस ऑफ सप्लाई ऑफ इसेंसियल कॉमोडिटी एक्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वे कम्ज्यूमर प्रोजेक्टशन लॉ को लेकर भी बेखबर हैं। दो दशक बाद भी शैशव में उपभोक्ता आंदोलन प्रदेश में 1989 में चार जिलों के मुख्यालयों पर उपभोक्ता फोरम स्थापित किए थे। 1988 में कंज्यूमर प्रोटेक्षन रूल्स की अधिसूचना जारी की गई थी। दो दशक का लंबा समय बीच जाने के बावजूद ग्राहकों के हितों की पैरवी करने वाला कानून अभी तक शैशव में ही है। बाजार की ताकत के आगे प्रदेश में अभी तक कोई बड़ा उपभोक्ता आंदोलन नहीं नहीं हुआ है, नतीजतन प्रदेश के ग्राहक लुटने को मजबूर हैं।


जागो ग्राहक जागो


खरीद के बाद बिल लेना न भूलें ।


पैकिंग वस्तुओं के निर्धारित मूल्यों से अधिक भुगतान न करें।


खरीद फरोख्त करते वक्त मोल भाव जरूर करनी चाहिए।


कम तोलने , ज्यादा वसूलने पर खाघ आपूर्ति विभाग में तुरंत श्किायत करें।


खरीद करते वक्त वस्तु की गुणवता को जरूर जांच लें।


दुकान में जाकर रेट लिस्ट जरूर देंखें, न होने पर दुकानदार से पूछें।


विभाग से श्किायत करें।

1 टिप्पणी :

  1. बहूत खूब. एक छोटा सा प्रयास हमारा भी है.. सहयोग की उम्मीद भी है. http://galsuna.blogspot.com

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