शनिवार, 21 नवंबर 2009
बिलासपुर -लेह रेल लाइन का सर्वे पूरा
शिमला. सामरिक दृष्टि से अहम 65 हजार करोड़ के रेल प्रोजेक्ट बिलासपुर -लेह रेल लाइन का सर्वे पूरा हो चुका है। इसी के साथ जोगेंद्रनगर से मंडी भी रेल मार्ग से जुड़ने वाला है। पठानकोट—जोगेंद्रनगर नेरो गेज रेल मार्ग की जगह ब्रॉडगेज रेल का सपना भी जल्द ही आकार लेने वाला है।
राज्यसभा में सीमा क्षेत्रों में रेल लाइन के विस्तार पर एक प्रश्न के लिखित उत्तर में रेल राज्य मंत्री ई अहमद ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जोगेंद्रनगर-मंडी के बीच नई रेल लाइन बिछाने केलिए सर्वे पूरा कर लिया गया है। रेल मंत्रालय अब सर्वेक्षण रिपरेट तैयार कर रहा है। बिलासपुर—लेह रेल लाइन के लिए मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को फरवरी 2008 में पत्र लिखा था।प्रदेश सरकार ने इस रेल मार्ग के निर्माण के लिए ट्रांस हिमालयन रेलवे प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से सितंबर 2008 में प्री फिजिबिलिटी सर्वे करवाया था, जिसे केंद्र की तकनीकी टीम ने अप्रूव कर लिया था। हालांकि प्रदेश कांग्रेस के लीडर इसे प्रदेश भाजपा सरकार का डे ड्रीम कहते रहे हैं। पठानकोट—जोगेंद्रनगर नेरो गेज लाइन की जगह ब्रॉड गेज लाइन बिछाने के लिए रेलवे मंत्रालय ने सर्वे शुरू कर दिया गया है। इस रेल लाइन को लेह—बिलासपुर रेल लाइन का हिस्सा बनाने के लिए इसको ब्रॉडगेज करने और मंडी तक इसका विस्तार करने का अनुरोध रेल मंत्रालय से मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने किया था।
सोमवार, 2 नवंबर 2009
बर्फीले रेगिस्तान में छह माह के लिए जिंदगी कैद
बर्फीले रेगिस्तान में छह माह के लिए जिंदगी कैद
शिमला. सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और दुनिया के सबसे ऊंचे सड़क मार्गो में शुमार मनाली—लेह सड़क मार्ग को सीमा सड़क संगठन ने आधिकारिक तौर पर 6 माह के लिए बंद कर दिया है।
बर्फबारी के चलते 1 नवंबर से 15 अप्रैल तक 35 हजार की आबादी वाले जिले लाहौल—स्पीति के कई दर्रो से होकर गुजरने वाले 222 किलोमीटर लंबे मार्ग पर वाहनों की आवाजाही भी बंद रहेगी। वहीं, लाहौल—स्पीति जिला भी छह माह के लिए शेष विश्व से कट जाएगा। इस दौरान यहां आने—जाने का एकमात्र जरिया हेलीकॉप्टर ही होगा।
इस मार्ग से लेह स्थित सेना के बेस कैंप के लिए रसद पहुंचाई जाती है। इस सड़क के रख रखाव का जिम्मा सीमा सड़क संगठन के पास है। 15 नवंबर के बाद सरकार इस मार्ग वाहन ले जाने पर पाबंदी लगाती है। इस दौरान सेना की रसद पठानकोट—जम्मू मार्ग से भेजी जाएगी।
सीमा सड़क संगठन दीपक परियोजना के मुख्य अभियंता आईआर माथुर ने रविवार को इस मार्ग के बंद किए जाने की घोषणा की। लाहौल घाटी में लोगों की आमदनी का मुख्य जरिया आलू और मटर की खेती ही है। छह माह तक लोग खेती पर खूब मेहनत करते हैं। हालांकि लाहौल—स्पीति के कई लोगों ने यहां से बाहर भी घर बना रखे हैं, लेकिन 60 फीसदी लोग सर्दी में भी यहीं रहना पसंद करते हैं।
घाटी के लोगों के लिए आसान नहीं यह समय काटना
कबायली जिले के लोगों के लिए बर्फबारी के बीच दौर रहना किसी चुनौती से कम नहीं है। सर्दियां शुरू होते ही यहां के बाशिंदों की धुकधुकी बढ़ जाती है। समुद्रतल से करीब 13050 फुट की ऊंचाई वाले रोहतांग र्दे पर बर्फ गिरते ही जिले में जिंदगी छह माह के लिए बर्फीले रेगिस्तान में कैद हो जाती है। लोगों ने छह माह के लिए राशन और अन्य जरूरी सामान इकट्ठा कर लिया है।
राशन पर सरकार लोगों को सब्सिडी दी जाती है। लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी तक होती है जब कोई बीमार हो जाता है। पिछली बार भी गंभीर रूप से बीमार लोग कई दिन जिले में ही फंसे रहे। क्षेत्र में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं न होने के कारण लोगों से हेलीकॉप्टर कुल्लू पहुंचाया गया था। 15 नवंबर सीमा सड़क संगठन कोकसर पुल को उखाड़ लेता है। इस बार इसे नहीं उखाड़ा जाएगा।
रोहतांग टनल पर टिकी आस
सर्दियों में भी लाहौल स्पीति देश दुनिया से जुडा़ रहे, इसकी आस रोहतांग टनल पर ही टिकी है। कारगिल युद्ध के बाद रोहतांग टनल बनाने की घोषणा हुई थी। मई 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने टनल का शिलान्यास किया था। 8.8 किलोमीटर लंबी सुरंग बनने से मनाली—लेह के बीच 40 किलोमीटर की दूरी कम हो जाएगी। 2004 की कीमतों के अनुसार सुरंग के निर्माण पर 1355.82 करोड़ रुपए खर्च होने थे।
शिलान्यास को आठ साल बीत जाने के बाद भी सुरंग का निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है। लोगों में इस बात को लेकर रोष है कि सरकार इतने साल से इस समस्या का कोई हल नहीं निकाल पाई है। यदि यह टनल बन जाती है तो सेना को पहले की तुलना में जल्दी रसद मिल सकेगी। वहीं पर्यटन क्षेत्र में भी विकास की संभावनाएं और बढ़ेंगीं।
रविवार, 6 सितंबर 2009
रविवार, 23 अगस्त 2009
हुस्न पहाडों का
रविवार, 21 जून 2009
शुक्रवार, 19 जून 2009
सुख का दुःख

मंगलवार, 16 जून 2009
मंडी से लड़ी जायेगी इंदौर की लडाई
डी से लड़ी जायेगी इंदौर की लडाई
निगम की तबादला नीतिसे प्रेषण कर्मचारी ने भेजी फरियाद
डीडी न्यूज़ के जानने का हक़ प्रोग्राम से मिला ब्यूरो का पत्ता
आरटीआई ब्यूरो ने मांगी वित्त निगम मद्य प्रदेश से सूचना
आरटीआई ब्यूरो डेस्क।
सूचना क्रांति के दौर में
रविवार, 14 जून 2009
अपनी कमजोरी से हरे काँगड़ा और शिमला

शनिवार, 13 जून 2009
हिमाचल के अटल

शुक्रवार, 12 जून 2009
गजल
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अपने तो साहिल भी रहे हैं मझधारों की तरह ।
खाए हैं यहाँ गुलों से भी जख्मखारों की तरह ।।
दौरे वक्त की हम पे बंदिशें तो देखो कि ,
अपने घर में भी रहे तो किरायेदारों की तरह ।।
............... भावुक.....................
गुरुवार, 11 जून 2009
गजल
हर गाँधी के हिस्से में गोली ही क्यों आती है।
अमन के हर पुजारी की क्यों छलनी होती छाती है।।
नींद में चलने वालों का जब कुनबा बढता जाता है,
कोई हस्ती आती है जो नींद से हमें जगती है।।
नई नस्ल के वारिसों इतिहास उठा कर देखो तो ,
नमन शहीदों को कर के आँखें नाम हो जाती है।।
बेकार कभी जाती नहीं सूरमाओं की शहादतें ,
कौम को बलिदान का इक रास्ता दिखलाती है।।
चंद वीरों के दम पर वजूद है जिन्दा कौम का,
लोरिओं में नतिओं को नानियाँ सुनती हैं ।।
गजल
तेरा भी काम हो रहा, है मेरा भी काम हो रहा।
चर्चा यह आम हो रहा कि सच नीलाम हो रहा।।
बेटा बसा है शहर में गांव् से बड़ी दूर ,
सालों से फोन पर ही दुआ सलाम हो रहा। ।
अ़ब हर नसीहत पर तय हुई तकरार भी,
रुतबा गया बाप का,बेटा जवान हो रहा।।
मसलों के नाम पर असलहे से लड़ी सरहदें,
दिन ब दिन जहाँ मैं जीना हरम हो रहा।।
.............भावुक...............
याद

मेरे सवाल बाकि हैं,तेरे जबाब बाकि हैं।।
पिछले जनम के कुछ हिसाब बाकि हैं।।
................भावुक ...............
बुधवार, 10 जून 2009
मंगलवार, 9 जून 2009
गुरुवार, 4 जून 2009
बुधवार, 3 जून 2009
अपने घर लोटेंगी पचास हेरिटेज पेंटिंग

काँगड़ा कलम की फनकारी का एक एतिहासिक दस्तावेज सात साल की कवायद के बाद आख़िर अपने घर लौट रहा है। नेशनल मयूसियम दिल्ली से पचास हेरिटेज पेंटिंग को काँगड़ा मयूसियम धर्मशाला को सोंपने पर सहमती हो गई है। इस सिलसिले में प्रदेश के भाषा विभाग के निदेशक प्रेम शर्मा ने दिल्ली में समझोते पर साइन किए। इन पेंटिंग्स में काँगड़ा, बसौली , बिलासपुर व् चंबा शेली की पेंटिंग शामिल है। प्रदेश सरकार की और से वर्ष २००२ से इन पेंटिंग को लेन की कोशिश चल रही थी। सात साल के बाद घर आ रही हिमाचल की इन धरोहरों का बाकायदा बीमाकरवाया गया है ।इन को काँगड़ा कला संग्राहलय में रखने की पूरी व्यवस्था कर दी गई है । २२ डिग्री तापमान तथा ५० से ५५ प्रतिशत नमी की व्यवस्था की गई है । सितम्बर में पेंटिंग धर्मशाला पहुँच जाएँगी। प्रदेश का भाषा विभाग सितम्बर में काँगड़ा मयूज़ियम में पेंटिंग पर नेशनल स्तर का सेमिनार का भी आयोजन करने जा जहा है। इस आयोगं में नेशनल मयूज़ियम नइ दिल्ली का सहयोग मिलेगा ।विभाग ने जनजातीय अकादमी बडोदा के साथ समझोता किया है। इस समझोते के तहत सिरमौर जिला के जमता में हिमालयन स्टडीज रिसर्च सेण्टरनिर्माण किया जाएगा। यहाँ फोक , आर्ट, कल्चर व् संगीत पर रिसर्च होगी । यह इंदिरा गांधी नेशनल ओपन विशवविध्यालय का सेण्टर फॉर एक्सीलेंसी होगा और यहाँडिप्लोमा कोरस चालाये जायेंगे। यह सेण्टर २०१० में शुरू होगा। सरकार ने इस के लिए पचास बीघा लैंड अलॉट कर दी गई है।
रविवार, 31 मई 2009
त्रियुंड : जन्नत ही जन्नत
त्रियुंड : जन्नत ही जन्नत
झमाझम बारिश के बीच ट्रैकिंग। इस रोमांच से भीगने के लिए हमने चुना हिमालय की धौलाधार पर्वत श्रृंखला का एक छोटा-सा ट्रैक 'त्रिउंड', जो करीब दस हजार फुट की ऊँचाई पर है। कभी टिपटिप बारिश तो कभी तेज बौछारों के बीच फिसलन भरे पहाड़ी रास्तों पर एक-एक कदम जमाने की जद्दोजहद ने हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला से ऊपर इस ट्रैक को यादगार बना दिया। हालाँकि यह ट्रैक लंबा भी किया जा सकता है अगर लाका और बर्फीले इंद्रहार दर्रा पार करते हुए
चंबा की ओर बढ़ा चला जाए, लेकिन बारिश में फिसलन भरे रास्ते के बाद, हो सकता है, आप भी हमारी तरह ऊपर चोटी की बर्फ देखने के बजाय एक रात अपने तंबू या अधपक्के घर में बादल की गर्जन-तर्जन महसूस करने के लिए रुक जाएँ।इस ट्रैक का सफर शुरू होता है मैक्लोडगंज से जो तिब्बत की निर्वासित सरकार की राजधानी है। दलाई लामा की पीठ होने के चलते यह दुनिया भर के बौद्धों के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। बौद्ध मठों और बौद्ध भिक्षुओं की इस नगरी से ही खुलता है त्रिउंड का रास्ता।
यह रास्ता आपको मेघालय के चेरापूँजी की याद दिलाता है जिसे कुछ समय पहले तक सबसे अधिक बारिश के लिए जाना जाता था। ऊपर त्रिउंड पहुँचते-पहुँचते दिन ढलने लगा था। ठंड और बारिश बढ़ गई थी। बादल खूब गरज रहे थे और चोटी पर बिजलियों का घेरा था।
इस पूरे ट्रैक में आपको सुनाई देती हैं बौद्ध मठों की घंटियों की मधुर ध्वनि, जो धुंध और नीचे उतर आए बादलों की सतह पर तैरती प्रतीत होती है। मैक्लोडगंज का एक बड़ा आकर्षण है भगसू फॉल्स और भगसू मंदिर। ठीक झरने के ऊपर से शुरू होता है 'त्रिउंड ट्रैक'। जब हमने अपना ट्रैक शुरू किया तो धीमी-धीमी फुहार पड़ रही थी, जो पूरे रास्ते कभी बहुत तेज तो कभी हलकी होती रही, लेकिन थमी नहीं।रास्ते भर हाथों में छाता और कंधे पर टंगे सामान को पन्नी से कसकर बाँधने के बावजूद हाथ-पैर नम से लगने लगते हैं। बारिश के चलते रास्ता ठीक से दिखता नहीं, पैरों का संतुलन गड़बड़ाता है। फिसलन इतनी है कि एक कदम गलत पड़ा और सैकड़ों फुट नीचे खाई में। ऐसे रास्ते पर छाते को थामे हुए चलना टेढ़ी खीर है। यह रास्ता आपको मेघालय के चेरापूँजी की याद दिलाता है जिसे कुछ समय पहले तक सबसे अधिक बारिश के लिए जाना जाता था। ऊपर त्रिउंड पहुँचते-पहुँचते दिन ढलने लगा था। ठंड और बारिश बढ़ गई थी। बादल खूब गरज रहे थे और चोटी पर बिजलियों का घेरा था। लगने लगा कि रात इन्हीं के साथ बीतेगी। त्रिउंड में रुकने के लिए सिर्फ वन विभाग का एक गेस्ट हाउस है, जो एक स्थायी इंतजाम है। वहाँ चोटी के पास थोड़ी-सी जगह समतल है जहाँ हमने बारिश और तेज हवा के बीच अपने टेंट गाड़े। तंबू के भीतर बैठे हम शमशेर बहादुरसिंह के शब्दों को याद कर रहे थे- "काल तुझसे होड़ है मेरी।" इस तरह से रात कटी और सुबह जब बाहर निकले तो चारों तरफ का नजारा इतना मासूम था कि लग ही नहीं रहा था कि रात क्या वलवला था। ऊपर बर्फ से ढँकी चोटियाँ और नीचे दिलकश घाटी। लौटते हुए मैक्लोडगंज और रास्ते में बने बौद्ध मठों की घंटियाँ यह आभास दिलाती रहीं कि निर्जन वन में कहीं दूर ही सही कोई है।
मछली का शिकार करने पर होगी तीन वर्ष कैद
गौर हो कि मत्स्य प्रजनन काल के दौरान शिकारी धड़ल्ले से मछली का शिकार करते हैं व बाजार में मुंह मांगी कीमत वसूलते हैं। नदियों की दूरी लंबी होने के कारण अकसर शिकारी विभाग के गार्डो की आंखों में धूल झोंककर अपने मंसूबों को अंजाम देते हैं। प्रजनन काल में मछली का शिकार होने से इनकी संख्या में भारी कमी आ जाती है। मत्स्य विभाग ने इस बार मछली के अवैध शिकार को रोकने के लिए कमर कस ली है।
प्रजनन काल में मछली का शिकार अवैध
मत्स्य विभाग के सहायक निदेशक सतपाल मेहता ने कहा कि प्रजनन काल में मछली का शिकार अवैध है। इस दौरान शिकारियों पर नजर रखने के लिए विभाग ने पूरी तैयारी कर ली है। प्रजनन काल के दौरान मत्स्य पालन करने वालों को जानकारी देने के लिए विभाग शिविरों का आयोजन भी करता है।
मंडी में बाप के हत्यारे को उम्र कैद
इसके अलावा 5 हजार रुपए जुर्माना व इसे अदा न करने की सूरत में उसे एक साल की अतिरिक्त कैद का भी फरमान सुनाया है। वहीं आईपीसी की दो अन्य धाराओं के तहत उसे 2-2 साल का साधारण कारावास व एक-एक हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है।
सजाएं साथ-साथ चलेंगी। 31 जनवरी 2008 को दीप राम व उसके पिता तेगू राम की आपस में किसी बात को पिता पर पत्थर से वार कर दिया था जिससे पिता की मौत हो गई थी।
सुखराम ने लिया सक्रिय राजनीति से संन्यास
अनिल हमेशा उनकी कमजोरी रहे। लोस चुनाव में अनिल ने सदर से लीड दिलाकर दिखा दिया कि वह राजनीति में जम गए हैं। सुखराम ने कहा कि सियासी मजबूरियों के चलते उन्हें अलग पार्टी बनानी पड़ी।
हालांकि उस समय भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अनिल शर्मा को राज्यसभा सदस्य के तौर पर भाजपा की सदस्यता लेने को कहा था, लेकिन उन्होंने इसे विनम्रता से ठुकरा दिया। उन्होंने माना कि वीरभद्र सिंह से उनके नीतिगत मतभेद रहे। व्यक्तिगत मतभेद कोई नहीं था।
अपने आवास पर वीरवार को पत्रकार वार्ता में कांग्रेस सुखराम ने कहा कि पिछले कार्यकाल में आनंद शर्मा की परफॉर्मेस के कारण ही उन्हें पदोन्नति दी गई। वीरभद्र सिंह को उनकी योग्यता और अनुभव के कारण कैबिनेट में लिया गया है। केंद्रीय मंत्रीमंडल में दो कैबिनेट मंत्री बनाकर कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रदेश के लोगों पर बहुत बड़ा एहसान किया है।
डीईओ ने मामले की रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय को भेज दी है। गत दिवस स्कूल में चार शिक्षकों को ब्ल्यू फिल्म देखते हुए गांव के लोगों ने पकड़कर एक अन्य कमरे में बंद कर पुलिस को सूचित कर दिया था। पुलिस ने मौके पर पहुंच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था।
पूछताछ के दौरान पुलिस को मामले में तीन अन्य शिक्षक व एक दुकानदार के भी शामिल होने का पता चला। उनके खिलाफ भी केस दर्ज किया गया है। उधर, नाराज ग्रामीणों ने हंगामा किया और हाईवे पर जाम भी लगाया।
सिरसा की जिला शिक्षा अधिकारी आशा किरण ग्रोवर ने बताया कि ब्ल्यू फिल्म देखने के प्रकरण में शिक्षा निदेशालय के निर्देशानुसार उक्त स्कूल के 10 शिक्षकों गुरमीत, जनकराज, सुरेश गिरी, सतपाल, राजकुमार, रवैल सिंह, मूलचंद के अलावा शुक्रवार को स्कूल से गैरहाजिर रहे तीन अन्य शिक्षकों संजीव कुमार, राजपाल व चंद्रजीत को सस्पेंड कर दिया गया है।
प्रिंसिपल ज्ञानचंद कंबोज को छोड़ कर स्कूल के पूरे स्टाफ का दबादला कर दिया गया है। इसके साथ ही मामले की और गहन जांच के लिए जांच समिति भी गठित की गई है। इस समिति में उप जिला शिक्षा अधिकारी गुरदेव सिंह, बीईओ यज्ञदत्त वर्मा व राजकीय सीनियर सेकंडरी स्कूल गुड़ियाखेड़ा के प्रिंसिपल जसपाल सिंह को शामिल किया गया है।
जांच रिपोर्ट के बाद अगली कार्रवाई की जाएगी। थाना डिंग के प्रभारी रामरूप ने बताया कि इस मामले में शेष आरोपियों रवैल सिंह, राजकुमार, मूलचंद व दुकानदार सतीश अभी तक पुलिस की गिरफ्त में नहीं आए हैं। पुलिस उनकी तलाश में जुटी है।
इस मामले में गिरफ्तार किए गए चार शिक्षकों गुरमीत, जनकराज, सुरेश गिरी व सतपाल को ड्यूटी मजिस्ट्रेट सुखजीत सिंह की अदालत में शुक्रवार को पेश किया गया। अदालत ने उनको जमानत पर रिहा कर दिया।
हिमाचल ने दिए प्यार के फूल
शुक्रवार, 29 मई 2009
वीरभद्र लोहा ढूंढ़ के लायेंगे और आनद शर्मा इंडस्ट्री लगायेंगे
गुरुवार, 28 मई 2009
राजा का सूर्य उदय, पंडितजी का सूरज अस्त


दखल : विनोद भावुक
प्रदेश में कांग्रेस की सियासत में साथ साथ शुरुआत करने
की ऊम्र में जहाँ सुखराम अपनी पारी को समेटने की
मंगलवार, 26 मई 2009
संस्मरण :न्यूयार्क नहीं नगरोटा
दो शब्द प्रेम के लिए
उसे लोगों को पढने का हुनर आता था ।
दरबारी सरकारी संस्कृति में आम आदमी
का पिसना उसे अंदर तक आहत कर
जाता था । एक ऑफिसर के रूप में
डॉक्टर प्रेम भरद्वाज अपनी बिरादरी के
सताये आम आदमी दा दर्द बाँटते मिलते थे
तो एक शायर अपने लफ्जों को आम आदमी
की जुबान में बिना लग लपेट के कहता
दिखता है । यह वही आदमी है जिसकी
अदा का कायल अगर भरमौर है तो डलहौजी
में भी उसकी कलम का कारोबार चलता है ।
छोटी काशी उस आदमी के काम को बरीकी
से देखती है । प्रेम का कारवां कहाँ कहाँ से
गुजरते हुए कहाँ कहाँ तक जा पहुंचता है ।
इस प्रेम में न्यूयार्क की नहीं नगरोटा की
हसरत है ।नौकरी पूरी हुई, बच्चों की शादियाँ
कर दी । अब उस जगह का हक़ अदा करने
का वक़त आ गाया। नगरोटा में प्रदेश का कल्चर
सेंटर विकसित हो इसी पर रात दिन मंथन व्
चिंतन चल रहा था । शुरू आत हो चुकी थी ।
इसी बीच प्रेम की प्यास जगा कर वो शख्स ख़ुद
किसी दूसरी दुनिया में प्रेम का अलख जगाने
निकल गया । काश कोई प्रेम की प्यास को
समझे और नगरोटा में प्रेम की अगन जगाये।
आगे फ़िर कभी ..........................
गजल
साफा
नजर ओआदा मुक्दा साफा ।
टोपिया पिचे लुक्दा साफा ।।
गरीब प्यो कूदी बिहानी ।
दरेली दरेली झुक्दा साफा ।।
बुम्बल बड़े सजाये कुद्मन ।
आदर खा तर पूछ दा साफा ।
सफेयाँ सफेयाँ फरक बटेर ।
इक लूटें , इक लुत्दा साफा ।।
पग परं बिच पोंडी आई ।
जह्लू जह्लू रुस्दा साफा ।।
हटिया भठिया गोरान गलियन ।
बस गरीबन जो मुछ्दा साफा ।।
लग जोग भी देना पांडे ।
ना इ बोलें कुस्दा साफा ।
गजल

जित्ते बेशक हारे लीडर ।
इको दे ही सारे लीडर ।।
जिथु मौका जाह्लू मिला ।
खाई जांदे चारे लीडर ।।
भीड़ चलाना पोंदी सोगी ।
खूब लगांदे लारे लीडर ।।
जिते तां नजर नि ओंदे ।
रहंदे टारे टारे लीडर।।
अकड़ जाह्लू ओना लगें ।
करना पोंदे टारे लीडर ।।
गजल

बिच रास्तें परकाला पोना।
सफरें जे तरकाला पोना।।
नोटां वाले होना लग्गे ।
हुण आखां पर जाला पोना ।।
धुंध बरसाती पोंदी आई ।
रुत बद्लोनी पाला पोना ।।
पहलें खूब बनाये चेले ।
हुन गुरुआ ने पाला पोना ।।
ठगी ठोरी चलदी रहनी ।
जाहलू तक है गाला पोना ।।
सनका ने ही होनियाँ गला ।
जे मूमे पर ताला पोना ।।
गजल

गद्देयां बोझे डोंदे रहना
कितना की फनोंदे रहना ।
काहलू तक दबोंदे रहना ।।
घोडेयां दोडाँ जीती लेइयाँ ।
गद्देयां बोझे डोंदे रहना ।।
हकां तांइ लड़ना पोना ।
नि मिलने जे रोंदे रहना।।
टब्बर बड़ा छपर छोटा।
बूडे बड़े संगोंदे रहना ।।
नी जादा भी रोंदे रहना ।
कितना की ठगोंदे रहना।।
बाबेयां माला जप्देयाँ रहना।
चोरा खीसे तोह्न्दे रहना ।।
गजल

बस मुंह ही नि फुलांना चाहिदा .
कदी सिर भी झुकाना चाहिदा ।
कदी सुख दुःख भी लाना चाहिद।
कोई तां अपना बनाना चाहिदा ।।
बन ही नी कटाना चाहिदा ।
कोई बूटा भी लाना चाहिदा।।
हल्ला ही नी पाना चाहिदा ।
कदी हथ भी बंडाना चाहिदा।।
कोई रुसदा मनाना चाहिदा ।
कोई रोंदा हंसाना चाहिदा ।।
कदी दिल भी लगाना चाहिदा ।।
कदी मिटना मिटाना चाहिदा ।।
खाना भी कुछ बचाना चाहिदा।
थोडा दान पुन कमाना चाहिदा।।
नाचना भी कने नचाना चाहिदा ।
पहलें तां गाना बजाना चाहिदा।।
कोई सपना सजाना चाहिदा ।
कोई बंजर बसाना चाहिदा ।।
कुत्ते जो तां मठुनी चाहीदी
चिडिया जो भी दाणा चाहिदा ।।
रविवार, 24 मई 2009
गजल

लगेया जीणा मरणा चाचा ।
मरणे ते क्या डरना चाचा ।।
शेर बणी के जीणा चाचा ।
भेड़ बणी नी मरणा चाचा ।।
हथ पैर भी हलाना पौने ।
रोज नी बूता सरना चाचा ।।
मरने बाद भी जिन्दा रहंदे ।
ऐसा कम कोई करना चाचा ।।
लश्कें गद्कें बेशक जिन्हा ।
पर नी लगदा बरना चाचा ।।
मश्केरा ने भारियाँ बीडाँ ।
पानिये सारें झरना चाचा ।।
आली बिच ही मारदा चुबीअं ।
कदी तां पतना तरना चाचा ।।
दफ्तर - दफ्तर बहरे टोने ।
देना पोना हुन धरना चाचा ।।
गल गठी नें बणी रखनी ।
जे करना सेह भरना चाचा ।।
शनिवार, 23 मई 2009
दुविधा में राजा, टेंशन में प्रजा

सरवाइवल कि लडाई लड़ रहे वीरभद्र को अगर विस्तार में उनके कद के मुताबिक पोस्ट नहीं मिलती है तो प्रदेश कांग्रेस में आर पार कि लडाई तय है । अगर एसा होता है तो हिमाचल में नुकसान कांग्रेस का ही होगा।
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
शुक्रिया! लिकर किंग
बापू पूरा जीवन सीना तान के चले। तब भी जब अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका में उन्हें रेल के डिब्बे से बाहर फेंक दिया। तब भी जब बिहार में नील के खेती करने वालों को उन्होंने उनका हक़ दिलाया। और, तब भी जब नाथूराम गोडसे की पिस्तौल उनके सीने के सामने तन चुकी थी।
बस बापू का सिर झुक जाता था तो गरीब देशवासियों की लाचरगी देखकर, उनकी गरीबी देखकर और उनकी आंखों में पलने वाले सपनों को चकनाचूर होते देखकर। मोहनदास करमचंद गांधी को सुभाष चंद्र बोस ने बापू कहा। देशवासियों से खून मांगने वाले एक सेनानी का अहिंसा को सबसे बड़ा हथियार बताने वाले दूसरे सेनानी को दिया गया ऐसा सम्मान कि पूरे देश ने साबरमती के इस संत को अपना बापू मान लिया।
बापू का पूरा जीवन विरोधाभासों से घिरा रहा। वो पूरे देश के बापू थे, लेकिन उनका अपना बेटा उनके सिद्धांतों का बाग़ी हो गया। बापू की प्रतिमा से चंद कदमों की दूरी पर संसद में बहस के नाम पर करोड़ों फूंक देने वाले तमाम नेताओं ने बापू से शायद ही कुछ सीखा हो। लेकिन सौ करोड़ भारतीयों की उम्मीदों पर पानी फिरने से बचाने का काम एक ऐसे शख्स ने किया, जिससे शायद बापू जिंदा होते तो कन्नी काटकर निकल जाते। जी हां, एक शराब का सबसे बड़ा विरोधी और दूसरा देश का लिकर किंग।
चांद पर तिरंगा लहराने वाले सौ करोड़ भारतीयों के पास अपने बापू की घड़ी, उनकी ऐनक, उनकी पीतल की कटोरी प्लेट और उनकी चप्पलें जल्द वापस आएंगी। सरकार जहां चूक गई, वहां कारोबार जगत के एक नुमाइंदे ने देशवासियों की उम्मीदें सांसत में फंसने से बचाईं। माल्या पहले भी टीपू की तलवार हिंदुस्तान ला चुके हैं। शुक्रिया, लिकर किंग। आपकी तिजोरी से कम हुए 18 लाख डॉलर, सौ करोड़ हिंदुस्तानी फिर भी चुका सकते हैं, लेकिन, बापू की विरासत बचाने की जो कीमत है, उसे अशर्फियों से भी नहीं तौला जा सकता।
कुंवारों में नसबंदी कराने का चलन शुरू
कुछ लोग नसबंदी के बदले मिलने वाले रुपये के लिए आपरेशन करा रहे हैं तो कुछ ऐसे कुंवारे भी आपरेशन कराने पहुंच रहे हैं जिन्हें अपनी महिला दोस्त के साथ शारीरिक संबंध बनाने हैं लेकिन दोस्त तैयार नहीं और पहले आपरेशन का सुबूत चाहती है। चौंक गए ना? दिल्ली के अस्पतालों में आए दिन दूसरे शहरों के लड़के भी आपरेशन कराने पहुंच रहे हैं। ऐसे ही हैं 21 साल के राहुल सामंत जो अच्छे परिवार से हैं, बड़ी कंपनी में काम करते हैं लेकिन अपनी दोस्त के कहने पर लोकनायक अस्पताल पहुंच गए नसबंदी कराने। डाक्टर ने पूछा तो लापरवाह जवाब था, बाद में खुल जाएगी।
संजय गांधी अस्पताल में पिछले ही महीने 20 वर्षीय प्रदीप कुमार ने आपरेशन करा लिया था। घर वालों को पता चला तो अस्पताल भागे और मां के कहने पर डाक्टरों को नसबंदी खोलनी पड़ी। जागरण में सुनील पाण्डेय लिखते हैं कि अस्पतालों में नसबंदी कराने आने वालों का चूंकि घरेलू रिकार्ड नहीं मांगा जाता, इसलिए कुंवारे इसका फायदा उठा लेते हैं।
फ़िर जेल कब जाओगे?
जब मैं पैदा हुई तो मुझमें दोष था क्योंकि मैं लड़की थी
दोष
जब मैं पैदा हुई तो मुझमें दोष थाक्योंकि मैं लड़की थीजब थोड़ी बड़ी हुई तब भी दोषी रहीक्योंकि मेरी बुद्धि लड़कों से ज़्यादा थीथोड़ी और बड़ी हुई तो दोष भी बड़ा हुआक्योंकि मैं सुन्दर थी और लोग मुझे सराहते थेऔर बड़ी होने पर मेरे दोष अलग थेक्योंकि मैंने ग़लत का विरोध कियाबूढ़ी होने पर भी मैं दोषी रहीक्योंकि मेरी इच्छाएं ख़त्म नहीं हुई थींमरने पर भी मैं दोषी रही क्योंकि इन सबके कारण असंभव थी मेरी मुक्ति.
रोशनी
उसका नाम रोशनी थाआदिवासी एक लड़कीजिसे बनना था ननवह कभी पागलों सा करतीमोटे लाल पपोटे उसकेजंगली फूलों से दिखतेबोलती तो लकड़ी के दरवाज़े थरथरातेआरियों सी काटती उसकी चीख़
मुझे पता है मेरा अंतयहीं कहीं है वह आसपासफूल-फूल नहीं प्यार नहींमुरझाना है मुझे वसन्त मेंसूरज बनना हैलाल एक पहाड़कोई दो मुझे मेरी नींद
दिलासा एक आसान पत्थर था जिस पर पतक देती वह सरसिस्टर कैथरीन उसे बांहों में भर लेतींरोशनी मेरी बच्ची
कई वर्ष बाद मिली रोशनीमेडिकल कॉलेज मेंवह डॉक्टर बन रही थीअच्छा करेगी वहबच्चों को और स्त्रियों कोबच्चे, स्त्री, ग़रीब रोशनी.
सूरज बुझाकर जब शाम के आँचल से,उस सांवली रात का चेहरा निहारा था,वही सूना पथ था, खुला ह्रदय पट था...और एक लंबा इंतज़ार तुम्हारा था
हवाओं ने हलके से केश बादलों का उडाया था,चाँद भी चन्दनी का हाथ थामे छत पर आया थाइनकी आँखों में छलकता प्यार हमारा था,...और एक लंबा इंतज़ार तुम्हारा था
मिलन की प्यास ले दरिया खिसक कुछ पास आया था,वहीं माझी ने किसी कश्ती से एक गीत उठाया था,बोल सारे नए थे पर भाव वही पुराना था,...और एक लंबा इंतज़ार तुम्हारा था
कई महफिलों में पढ़कर आया था ग़ज़ल तेरे नाम की ,दबी-ज़ुबाँ लोगों ने बज्म में तेरा नाम भी फुसफुसाया था,यूँ तो बात तेरी थी पर तखल्लुस हमारा था...और एक लंबा इंतज़ार तुम्हारा था
क्या यही पाकिस्तान है ?
एल फॉर लखवी जे फॉर जरारशब्दकोष में नही है प्यारखुनी जमीन, सहमा आसमानइसी का नाम है पाकिस्तान ....!झूठ बोलो -मुकर जाओदामन अपने कुतर जाओख़ुद नही सुधरे मगरआपस में बोले सुधर जाओबी फॉर बैतुलाह के फॉर करारतालीबानी अपने हैं यारसुरक्षित नही मेहमानइसी का नाम है पाकिस्तान.........!हिंसा हीं अपना है धर्मन लज्जा नही कोई शर्मतमंचों से मिल जाती रोटीतो क्यूंकर करें कोई कर्म?एच फॉर हिंसा टी फॉर तकरारकर रहे लोग असलहों से प्यारतमाशबीन हैं हुक्मरानइसी का नाम है पाकिस्तान .....!सपनों का कर दिया खूनलिफाफे से गायब मजमूनन बचपन रहा न जवानीकैसे मनाये हनीमून?के फॉर कियानी वी फॉर वारअसमंजस में है सरकारमगर फ़िर भी है वह इत्मीनानइसी का नाम है पाकिस्तान ...!
जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं
'पता नहीं क्यों हर आदमी माइक्रोसौफ्ट को कोसने में लगा रहता है। सच कहूँ, मुझे तो Windows [से प्यार] ... है। ...मैक पर [हिन्दी में काम करने के लिये] ... एक गन्दे से की-बोर्ड ले-आउट के अलावा कुछ भी नहीं है। ...जो लोग लिनक्स का गुण-गान करते हैं… उनका तो अल्लाह ही मालिक है.... कंसोल में काम करना है तो ठीक है, KDE/ Gnome तो अभी भी कचरा हालत में हैं।'अच्छा सवाल है।
मेरा एक मित्र विंडोस़ प्रेमी है। मुझसे अक्सर कहता है कि मैं लिनेक्स छोड़ कर विंडोस़ अपना लूं। कल ही मेरे इसी मित्र ने एक ईमेल भेजी जो शायद अन्तरजाल में घूम रही है। यह हिन्दी में इस प्रकार है, 'बिल गेटस् प्रति सेकेण्ड २५० यू०एस० डालर अर्जित करते हैं जो कि लगभग 2 करोड़ यू०एस० डालर प्रतिदिन और ७३ अरब यू०एस०डालर प्रति वर्ष होता है।यदि उनसे १००० डालर गिर जाता हैं तो उसे उठाने के लिये वे कष्ट नहीं उठायेंगे क्योंकि सेकेण्ड में वे उसे उठायेंगे और इतने समय में १००० डालर अर्जित कर लेंगे।अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज ५.६२ खरब है, यदि बिल गेटस् को यह ऋण स्वयं चुकता करना हो तो वह इसे १० वर्ष से कम समय में कर देगे।वह पृथ्वी पर प्रति व्यक्ति १५ यू०एस० डालर दान करते हैं तब भी उनके पास जेब खर्च के लिए ५० लाख डालर शेष रह जायेगा।माइकल जार्डन अमेरिका में सबसे अधिक धन अर्जित करने वाले खिलाड़ी हैं। उनकी सम्पूर्ण वार्षिक आय ३०० लाख डालर है। यदि वे खान-पान पर खर्च न करें तो उन्हें बिल गेटस् के बराबर धनी होने में २७७ वर्ष तक इन्तजार करना पड़ेगा।यदि बिल गेटस् एक देश होते तो वे पृथ्वी पर सबसे धनी देश होते।यदि आप बिल गेटस् के सभी धन को एक डालर के नोट में बदलें तो आप धरती से चन्द्रमा तक की दूरी से १४ गुनी लम्बी आने जाने वाली सड़क तैयार कर सकते हैं। किन्तु आपको इस सड़क को बिना रूके १४०० वर्षों में बनाना होगा और ७१३ बोइंग ७४७ जहाज सभी धन के आवागमन के लिये प्रयोग करना होगा।यदि हम कल्पना करें कि बिल गेटस् अगले ३५ वर्षों तक जीवित रहते हैं और यदि वे ६.७८ लाख डालर प्रतिदिन खर्च करें केवल तभी स्वर्ग जाने के पहले वे अपनी सारी सम्पत्ति समाप्त कर पायेंगे।'मुझे यह तो मालुम था कि विंडोस़ दुनिया का सबसे लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम है तथा बिल गेटस् दुनिया के सबसे सफल एवं अमीर व्यक्ति हैं पर यह नहीं मालुम था कि वे इतने अमीर व्यक्ति हैं। मुझे लगता है कि लोग तो जलते हैं बस इसलिये कोसते हैं।
इस ईमेल के समाप्ति पर कुछ और भी स्माईली के साथ लिखा था। 'अंत में भी बताना उचित होगा कि यदि माइक्रोसाफ्ट विन्डोस के प्रयोगकर्ता को कम्प्यूटर के हर बार अवरोध (हैन्ग) होने पर उसे एक डालर का हर्जान दिया जाय तो बिल गेटस् ३ साल में ही दिवालिया हो जायेंगे।'
लोग लिनेक्स क्यों पसन्द करते हैं इस बारे में सुश्री एन्ड्रिया कॉर्डिंगली के विचार मैंने यहां लिखे हैं। मैं तो लिनेक्स पर इसलिये काम करता हूं क्योंकि मुझे इसका दर्शन अच्छा लगता है, यह कुछ भाईचारे की बात लगती है, और इस पर बौद्धिक सम्पदा की झंझट नहीं है। पर,
जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं? शायद अल्लाह के पास पहुंचने के लिये, या फिर... होने के लिये करते हैं।